रविवार, 15 अगस्त 2010

आजादी के सन्दर्भ में !!!

लो आजादी की वर्षगाठ हर वर्ष की तरह फिर से आकर चली गयी |
स्कुलो और सरकारी दफ्तरों में ध्वजारोहण का कार्यक्रम हुआ -
हर साल की तरह शहीदों की शहादत को याद किया गया ,
राष्ट्र गान और आजादी पर कुछ शब्द सुनाई दिए ,
ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ मोटर मालिको ने छोटे झंडे ख़रीदे,
टीवी पर कुछ एक चैनलों ने के३जी और वांटेड सरीखी देशभक्ति फिल्मे दिखाई ,
प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा झंडा फहराया -
और पहले से लिखा हुआ राष्ट्र के नाम सन्देश पढकर सुनाया,
देश में महगाई चाहे कैसी भी हो, कश्मीर में कितने भी खून बहे-
कॉमन वेल्थ गेम में चाहे कितने ही घोटाले क्यूँ ना हो-
इन सब के उनके सन्देश में कंही जिक्र नहीं था |
देश तरक्की कर रहा, बिकसित होने की राह पर चल रहा -
यंही राग बार बार बार सुनाई पड़ रहा था |
पर यह एकदिन की आजादी का जोश हमेशा की तरह -
शाम ढलते ही खग की भांति अपने अतीत के घोसले में छिप जाता है ,
और अगले साल की आने के प्रतीक्षा में फिर से रत जाता है |

1 टिप्पणी:

  1. woh sochte the ki soch ki keemat kuchh aisi hogi
    watan ki raah par miten toh manzil muqammal hogi
    par shaheedon ke kabr par aaj jab lage hain mele
    toh un gareeb, zinda laashon, ki sudh kaun le
    gareebon ki socho toh nasamajh, baudam kehlaoge
    is daulat ki bhookhi duniya mein kaise jee paaoge?
    shaheedon ke is watan mein aaj hai maut sasti
    yaad karte hai unhe kyunki hai murdaparaston ki basti
    imaan aaj bikta hai byopaar ban kar
    watan aaj sajta hai bazaar ban kar

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