रविवार, 23 मई 2010

टूटता तारा....


एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |

खुली आँखों से कभी तो कभी सपनो की नींद में,
खोजता हूँ उसे अपनी सुर्ख आँखों की सीध में,
कभी पूर्णिमा को,और कभी अमावश के बीच में-
ढूँढता हूँ उसे इन अनगिनत तारों के भीड़ में ,

द्रवित मन के आवेग में अब कुछ सूझता नहीं है ,
एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |

रो रो कर मन ही मन , अधीर बनकर पछताया ,
न दीखने का कारण क्या है- अब तक मै न समझ पाया,

आँखों में नमी के आने से या वो धुंधला गया है ,
या फिर रूठ कर हमसे वो कंही दूर हो गया है ,
श्वेत बारिद के आँचल से या वो ढक गया है ,
नहीं तो फिर चाँद के ओट वो कंही छिप गया है ,

आखिरी लम्हों में बस कुछ खबरे मिली थी ,
चाँद के साथ सगाई की , उसकी बात चली थी ,
सुनते ही मेरे मुखड़े पे ,एक मुस्कान खिली थी ,
संतुष्टि भरी खबर से , बस आँखे भर चली थी,


रोज की मेरी टकटकी से, चाँद थोडा सिहर गया था ,
गुस्से से अपने तारे पे , वो थोडा विफर गया था ,
मै फर्श पे और वो अर्श पे - ये बात ना समझ पाया था ,
इस पावन रिश्ते की डोर,कर मन से ना पकड़ पाया था ,

मन को लाख सिखाया खुश रहना-पर सीखता नहीं है
एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |

PS
"ये तारे भी अजीब होते हैं, सदा टिमटिमाते रहते हैं,
कुछ भी हो गिला -शिकवा, पर चाँद के साथ ही रहते हैं,"

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