खुली आँखों से कभी तो कभी सपनो की नींद में,
खोजता हूँ उसे अपनी सुर्ख आँखों की सीध में,
कभी पूर्णिमा को,और कभी अमावश के बीच में-
ढूँढता हूँ उसे इन अनगिनत तारों के भीड़ में ,
द्रवित मन के आवेग में अब कुछ सूझता नहीं है ,
एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |
रो रो कर मन ही मन , अधीर बनकर पछताया ,
न दीखने का कारण क्या है- अब तक मै न समझ पाया,
आँखों में नमी के आने से या वो धुंधला गया है ,
या फिर रूठ कर हमसे वो कंही दूर हो गया है ,
श्वेत बारिद के आँचल से या वो ढक गया है ,
नहीं तो फिर चाँद के ओट वो कंही छिप गया है ,
आखिरी लम्हों में बस कुछ खबरे मिली थी ,
चाँद के साथ सगाई की , उसकी बात चली थी ,
सुनते ही मेरे मुखड़े पे ,एक मुस्कान खिली थी ,
संतुष्टि भरी खबर से , बस आँखे भर चली थी,
रोज की मेरी टकटकी से, चाँद थोडा सिहर गया था ,
गुस्से से अपने तारे पे , वो थोडा विफर गया था ,
मै फर्श पे और वो अर्श पे - ये बात ना समझ पाया था ,
इस पावन रिश्ते की डोर,कर मन से ना पकड़ पाया था ,
मन को लाख सिखाया खुश रहना-पर सीखता नहीं है
एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |
PS
"ये तारे भी अजीब होते हैं, सदा टिमटिमाते रहते हैं,
कुछ भी हो गिला -शिकवा, पर चाँद के साथ ही रहते हैं,"

I think I understand the story behind it Man... Very beautiful way of expressing the same. You rock...
जवाब देंहटाएंawesome...very beautiful...
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंsabdo ko khubsurti se aapne dhala ha najara in sabdo ka bada hi pyara ha
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