लो आजादी की वर्षगाठ हर वर्ष की तरह फिर से आकर चली गयी |
स्कुलो और सरकारी दफ्तरों में ध्वजारोहण का कार्यक्रम हुआ -
हर साल की तरह शहीदों की शहादत को याद किया गया ,
राष्ट्र गान और आजादी पर कुछ शब्द सुनाई दिए ,
ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ मोटर मालिको ने छोटे झंडे ख़रीदे,
टीवी पर कुछ एक चैनलों ने के३जी और वांटेड सरीखी देशभक्ति फिल्मे दिखाई ,
प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा झंडा फहराया -
और पहले से लिखा हुआ राष्ट्र के नाम सन्देश पढकर सुनाया,
देश में महगाई चाहे कैसी भी हो, कश्मीर में कितने भी खून बहे-
कॉमन वेल्थ गेम में चाहे कितने ही घोटाले क्यूँ ना हो-
इन सब के उनके सन्देश में कंही जिक्र नहीं था |
देश तरक्की कर रहा, बिकसित होने की राह पर चल रहा -
यंही राग बार बार बार सुनाई पड़ रहा था |
पर यह एकदिन की आजादी का जोश हमेशा की तरह -
शाम ढलते ही खग की भांति अपने अतीत के घोसले में छिप जाता है ,
और अगले साल की आने के प्रतीक्षा में फिर से रत जाता है |

woh sochte the ki soch ki keemat kuchh aisi hogi
जवाब देंहटाएंwatan ki raah par miten toh manzil muqammal hogi
par shaheedon ke kabr par aaj jab lage hain mele
toh un gareeb, zinda laashon, ki sudh kaun le
gareebon ki socho toh nasamajh, baudam kehlaoge
is daulat ki bhookhi duniya mein kaise jee paaoge?
shaheedon ke is watan mein aaj hai maut sasti
yaad karte hai unhe kyunki hai murdaparaston ki basti
imaan aaj bikta hai byopaar ban kar
watan aaj sajta hai bazaar ban kar