some new collections
शनिवार, 22 जनवरी 2011
रविवार, 21 नवंबर 2010
कुछ शेर अर्ज़ है ....
When heart beating for some one-
तुम कह दो तो हवाओं का रुख मोड़ दूँ ,गगन से चमकते सितारों को तोड़ दूँ ,
दूर वादियों में मै, बनकर क्षितीज -इस जमीं को सुहाने फलक से जोड़ दूँ,
When heart broken by some one-
हवाओं का रुख आखिर किसने मोड़ा है ?चमकते सितारों को आखिर किसने तोडा है ?
लोग कहते हैं हर जख्म भर सकता है लेकिन- टूटे दिलों को आखिर किसने जोड़ा है |
............................................................................................................................................बिन पत्तों के शाख हूँ मै|
अपने कर्मो का अपयश था , या फिर किसी की हाय लगी ,
जीवन आंधी के बियाबान में, या फिर कोई बिजुरी गिरी ,
सूखे तन का हाल देख , बस मै यंही समझ पाया -
एक कुंठित अवसाद हूँ मै -
...बिन पत्तों के शाख हूँ मै|
.........................................................................................
बिना शाख के एक पत्ता हूँ मै |
सरगोशियों के संग , बहा जा रहा हूँ मै हर पहर,
तनहाइयों के संग, डूबा जा रहा हूँ मै इस कदर,
गम-ए-बारिश का तेज झोकों में उलझते हुए -
अश्को की नमी में , उड़ा जा रहा हूँ मै दर-बदर,
...
उनकी नजरो में एक खता हूँ मै,
बिना शाख के एक पत्ता हूँ मै |
........................................................................................टूटे दिल का हाल अब कासे कहूँ, अश्को ने भी बहना छोड़ दिया.........
लफ्जों से दर्द मै पी न सका , जब उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया ............
सोचा था संभालूँगा खुद को - गिरने से मैखाने की चौखट पर ..........
किस्मत में मधुबन की गलियां थी, तो पैमाने से खुद को जोड़ लिया ..
रविवार, 15 अगस्त 2010
आजादी के सन्दर्भ में !!!
लो आजादी की वर्षगाठ हर वर्ष की तरह फिर से आकर चली गयी |
स्कुलो और सरकारी दफ्तरों में ध्वजारोहण का कार्यक्रम हुआ -
हर साल की तरह शहीदों की शहादत को याद किया गया ,
राष्ट्र गान और आजादी पर कुछ शब्द सुनाई दिए ,
ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ मोटर मालिको ने छोटे झंडे ख़रीदे,
टीवी पर कुछ एक चैनलों ने के३जी और वांटेड सरीखी देशभक्ति फिल्मे दिखाई ,
प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा झंडा फहराया -
और पहले से लिखा हुआ राष्ट्र के नाम सन्देश पढकर सुनाया,
देश में महगाई चाहे कैसी भी हो, कश्मीर में कितने भी खून बहे-
कॉमन वेल्थ गेम में चाहे कितने ही घोटाले क्यूँ ना हो-
इन सब के उनके सन्देश में कंही जिक्र नहीं था |
देश तरक्की कर रहा, बिकसित होने की राह पर चल रहा -
यंही राग बार बार बार सुनाई पड़ रहा था |
पर यह एकदिन की आजादी का जोश हमेशा की तरह -
शाम ढलते ही खग की भांति अपने अतीत के घोसले में छिप जाता है ,
और अगले साल की आने के प्रतीक्षा में फिर से रत जाता है |
स्कुलो और सरकारी दफ्तरों में ध्वजारोहण का कार्यक्रम हुआ -
हर साल की तरह शहीदों की शहादत को याद किया गया ,
राष्ट्र गान और आजादी पर कुछ शब्द सुनाई दिए ,
ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ मोटर मालिको ने छोटे झंडे ख़रीदे,
टीवी पर कुछ एक चैनलों ने के३जी और वांटेड सरीखी देशभक्ति फिल्मे दिखाई ,
प्रधानमंत्री ने लाल किले पर तिरंगा झंडा फहराया -
और पहले से लिखा हुआ राष्ट्र के नाम सन्देश पढकर सुनाया,
देश में महगाई चाहे कैसी भी हो, कश्मीर में कितने भी खून बहे-
कॉमन वेल्थ गेम में चाहे कितने ही घोटाले क्यूँ ना हो-
इन सब के उनके सन्देश में कंही जिक्र नहीं था |
देश तरक्की कर रहा, बिकसित होने की राह पर चल रहा -
यंही राग बार बार बार सुनाई पड़ रहा था |
पर यह एकदिन की आजादी का जोश हमेशा की तरह -
शाम ढलते ही खग की भांति अपने अतीत के घोसले में छिप जाता है ,
और अगले साल की आने के प्रतीक्षा में फिर से रत जाता है |
रविवार, 23 मई 2010
टूटता तारा....
खुली आँखों से कभी तो कभी सपनो की नींद में,
खोजता हूँ उसे अपनी सुर्ख आँखों की सीध में,
कभी पूर्णिमा को,और कभी अमावश के बीच में-
ढूँढता हूँ उसे इन अनगिनत तारों के भीड़ में ,
द्रवित मन के आवेग में अब कुछ सूझता नहीं है ,
एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |
रो रो कर मन ही मन , अधीर बनकर पछताया ,
न दीखने का कारण क्या है- अब तक मै न समझ पाया,
आँखों में नमी के आने से या वो धुंधला गया है ,
या फिर रूठ कर हमसे वो कंही दूर हो गया है ,
श्वेत बारिद के आँचल से या वो ढक गया है ,
नहीं तो फिर चाँद के ओट वो कंही छिप गया है ,
आखिरी लम्हों में बस कुछ खबरे मिली थी ,
चाँद के साथ सगाई की , उसकी बात चली थी ,
सुनते ही मेरे मुखड़े पे ,एक मुस्कान खिली थी ,
संतुष्टि भरी खबर से , बस आँखे भर चली थी,
रोज की मेरी टकटकी से, चाँद थोडा सिहर गया था ,
गुस्से से अपने तारे पे , वो थोडा विफर गया था ,
मै फर्श पे और वो अर्श पे - ये बात ना समझ पाया था ,
इस पावन रिश्ते की डोर,कर मन से ना पकड़ पाया था ,
मन को लाख सिखाया खुश रहना-पर सीखता नहीं है
एक तारा था फलक पे ,जो आजकल दिखता नहीं है |
PS
"ये तारे भी अजीब होते हैं, सदा टिमटिमाते रहते हैं,
कुछ भी हो गिला -शिकवा, पर चाँद के साथ ही रहते हैं,"
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